सच का इनाम
सच का इनाम
ईमानदारी आज के समय मे शब्द उतना खास लगता नही बस सुने में ही मिलता है और दिखाई कहीं नही देता। आज के समय मे लोग इस शब्द से कोसो दूर हो गए हैं। लेकिन कुछ लोगों को लेकर हम सभी के बारे में यह राय नही बना सकते की कोई भी ईमानदार नही है। इसी तरह 1 घटना मेरे साथ हुई, मैं कुछ आपने काम से आपने घर भाली से जसूर जा रहा था। मेरे घर से जसूर लगभग 30-40 km दूर है। आमतौर पर में बस में नही बल्की अपनी स्कूटी में ही जाता हूं लेकिन आज में बस में गया, और बस में जब भी कहीं जाता हूं तो कई नए लोगों को देखने का मौका मिलता है। तो मैं घर से लगभग 3:15 पर बस स्टॉप पहुंच गया वहाँ मेरे से पहले भी काफी लोग बस का इंतजार करने के लिए खड़े थे। मेरे पहुँचते ही एक हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस भी आ गयी। कुछ लोग बस से उतरे और कुछ बस में चढ़ गये। मेरे पीछे 1 लड़का और भी था देखने में लगभग मेरी ही उम्र का लग रहा था। वो भी मेरे साथ ही बस में चढ़ गया हम बस के पीछे वाले दरबाजे से चढ़े ओर बाकी लोग आगे वाले दरबाजे से चढ़े। बस में बैठने को सीटे न होने के कारण में चलता हुआ आगे कंडक्टर के पास चला गया जो आगे बाले दरबाजे के पास खड़ा था वो लड़का पीछे ही रुक गया। मैने आपना किराया कटवाया और आगे खड़ा रहा थोड़ी आगे चलने पर बस फिर लोगो को उतारने के लिए रुकी तब पीछे सीटे खाली हुई और वो लड़का बैठ गया उसके पीछे वाली सीट भी खाली थी तो में भी वहाँ जा कर बैठ गया। बस आगे चली और ओर इसी तरह लगभग 10-15 km तक बस ऐसेही चलते गयी और कंडक्टर आगे ही खड़ा रहा बीच मे बहुत से स्कूल के बच्चे बस में चढ़े ओर उतरते रहें। हिमाचल में स्कूल के बच्चों से किराया नही लिया जाता तो कंडक्टर बहीं आगे ही खड़ा रहा। आगे जोंटा नाम की जगह आती है वहाँ कंडक्टर पीछे आया और किराया काटने लगा। कंडक्टर के ध्यान से वो लड़का निकल गया था उसको उसका किराया काटने की याद ही नही रही थी तो वह उसे छोड़ के आगे निकल गया। लड़के ने अपनी जेब से पैसे निकलते हुए कंडक्टर की तरफ किये ये देखते ही कंडक्टर को भी उसकी याद आ गयी लेकिन कंडक्टर ये भूल गया था कि वो लड़का बस में चढ़ा कहाँ है। इसलिए कंडक्टर ने उस लड़के से ही पूछ किया कि कहाँ चड़ा है। लड़के ने आराम से जबाब देते हुए कहा की भाली कंडक्टर को सुनाई न दिया और कंडक्टर ने खुद बीच के एक स्टेशन का नाम लेते हुए कहा कि वहां चड़े हो तो लड़के ने उससे फिर से कहा कि नही भाली कंडक्टर लड़के की तरफ देख कर मन मे ही कुछ सोचने लगा और लड़के के हाथ से 100 का नोट लेते हुए उसे 70 रुपए लौटाए ओर टिकट हाथ में देते हुए आगे निकल गया। पहले तो वो लड़का भी थोड़ा सोच में पड़ गया क्योंकि भाली से जसूर तक का किराया 50 से 60 रुपए लेते है लेकिन यहां तो बिल्कुल ही आधा किराया लिया।लेकिन जब उसने टिकट देखी तो उसमें जोंटा से जसूर तक का 28 रुपए ही टिकट कटा हुआ था।उस लड़के ने भी एक नज़र कंडक्टर की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए टिकट को जेब में रख दिया। बचपन से ही ईमानदार लकड़हारा और इस तरह की कई कहानियां सुना करता था लेकिन ये बाते सिर्फ कहानियां ही लगती थी। वास्तविक जीवन मे एकहिं नज़र नही आती थी। लेकिन आज उस लड़के की ईमानदारी को देखके इस बात पर यकीन हो गया कि ये कहानियां ही नही बल्कि असलियत में भी इन बातों का प्रभाव है। हम जब स्कूलों में जाया करते थे तो हमको बचपन से ही इन कहानियों को पढ़ाया और सुनाया जाता था लेकिन आजकल के स्कूलों में इस तरह की शिक्षा को ज्यादा महत्व नही दिया जाता। नैतिक शिक्षा से ज्यादा बच्चों को किताबी कीड़ा बनाया जा रहा है। बच्चों को बचपन से ही इस तरह की नैतिक शिक्षा दी जाए तो बच्चें बड़े होकर समाज को एक सही दिशा की ओर लेजा सकते हैं।

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