मैं और मेरी गद्दी बोली

वैसे तो में कांगडा में रहता हूँ, लेकिन हूँ मैं चम्बा जिला के हड़सर गांव से। पहाड़ो के बीच एक छोटा सा गांव हैं। चम्बा जिला के जिस हिस्से से में हूँ उस तरफ ज्यादातर लोग गद्दी हैं और उनकी बोली भी गद्दी ही है। मैं भी इन्हीं लोगो मे से एक हूँ। आज के समय मे युवा वर्ग अपनी संस्कृति को शहरों की तरफ आ कर भूल रहे हैं। आधुनिकीकरण का तूफान इस कदर हमारी संस्कृति पर पड़ रहा है कि युवा अपनी संस्कृति को धीरे-धीरे भूल रहा है आज के समय में माता-पिता भी अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से दूर कर रहे हैं। मैं नही कहता कि समय के साथ चलना गलत बात है लेकिन अपनी संस्कृति को छोड़ देना ये भी सही नहीं है। बोली भी हमारी संस्कृति का ही हिसा हैं और जैसे जैसे लोग शहरों की तरफ आ रहे हैं वैसे वैसे वह अपनी बोली को भी गांव में ही छोड़ रहे है। मुझे आपने गांव से दूर रहते हुए लगभग 15 साल हो गए है लेकिन जब से मैं गांव से आया हूँ तब से आपने आप को एक पल भी ऐसा एहसास नही होने दिया कि मैं इस बोली से अलग हो रहा हूँ और न ही कभी इसे बोलने में शर्मिंदगी मेहसूस की। बोली एक हमारी ऐसी पहचान है जिसके जरिये लोग हमें बिना हमारे बारे में पूछे ही पता लगा लेते है कि हम कहां से हैं। किसी भी क्षेत्र की पहचान उस की बोली होती है और हिमाचल प्रदेश तो एक ऐसा राज्य है जहां कुछ किलोमीटर चलने पर ही बोलियां बदलने लग पड़ती हैं। आज जहां लोग अंग्रेजी बोलने को अपनी सान समझते है वहीं आज भी कुछ लोग ऐसे है जो अपनी बोली में ही ख़ुश है। मुझे हैरानी तब होती है जब आज के माँ बाप आपने बच्चों को उनकी बोली बोलने पर डाँटना चालू हो जाते है। बात करते है गद्दी बोली कि तो मुझे इस बारे में कुछ खाश पता नही है कि ये कब से शुरू हुई कहाँ से इस बोली को बोले जाना लगा। शुरुआत की बात की जाए तो इसका मुझे ज्यादा पता नही है घर बालो से और बाकी जानकारों लोगो से भी बात कर के इसके बारे में उतना पता नही चल पाया। और बात आज की की जाए तो हिमाचल प्रदेश में भरमौर के अलावा बैजनाथ, पालमपुर और धर्मशाला कई जगहों पर इसे बोला ओर समझा जाता है। मैं जहां रहा हूँ वहां के रीति रिवाज और वहाँ की बोली हमारे रीति रिवाज ओर बोली सी बिल्कुल अलग थी। इसलिए आज भी मैं कई शब्दों को मैं सीख ही रहा हूँ।

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